Wednesday, January 13, 2010

जहां करोड़ों श्रद्धालु पहुंचेंगे वहीं चरसी भी दिखें तो आश्चर्य मत करना।

सदी के पहले महाकुंभ में जहां करोड़ों श्रद्धालु पहुंचेंगे, वहीं अगर 'दम मारो दम' की तर्ज पर चरस में चूर चरसी भी दिखें तो आश्चर्य मत करना। जहां धार्मिक आस्था से लबरेज लोगों के लिए यह सुनहरा मौका है, वहीं चरसियों और चरस तस्करों का जमावड़ा लगने के भी पूरे आसार हैं। इसे देखते हुए भारत-नेपाल सीमा की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाली एजेंसी सीमा सुरक्षा बल (एसएसबी)ने अलर्ट जारी किया है। सीमा पर चरस तस्करों को रोकने के लिए विशेष चौकसी बरती जा रही है। कुंभ के दौरान बड़ी संख्या में विदेशी टूरिस्ट भी आएंगे। साधु संतों के साथ विदेशी टूरिस्टों में भी चरस की अच्छी खासी मांग रहती है। डिमांड बढ़ जाने से इसके दाम भी अच्छे मिल जाते हैं। वैसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत करीब 2 लाख रुपए प्रति किलो है। इसलिए चरस तस्कर भी इस मौके का फायदा उठाने के लिए तैयार हैं। एसएसबी की 10 वीं वाहिनी के कमांडेंट बी. एस. टोलिया ने बताया कि कुंभ में चरस की डिमांड बढ़ने के आसार हैं। चरस की तस्करी ज्यादातर नेपाल से होती है, इसलिए तस्करी की आशंका को देखते हुए हमने बॉर्डर पर सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए हैं। ये मौसम भी तस्करों को रास आता है, क्योंकि भारत-नेपाल को बांटने वाली काली नदी पर पानी कम होता है। इस कारण सीमा पार करने में तस्करों को आसानी होती है। हमने उत्तराखंड से लगने वाली नेपाल की सभी सीमाओं पर अलर्ट जारी कर दिया है। भारत में जहां भांग की खेती गैरकानूनी है, वहीं नेपाल में भांग की खेती पर प्रतिबंध नहीं है। वहां इसका भारी मात्रा में उत्पादन होता है। नेपाल के महाकाली अंचल में ज्यादातर इलाकों की इकॉनमी भांग पर ही टिकी है। नेपाल में बनी चरस की सबसे बड़ी मार्केट भारत ही है। इसलिए चरस तस्कर भी महाकुंभ के मौके को भुनाने की फिराक में हैं।

Sunday, January 10, 2010

संसद के शीतकालीन सत्र ने महंगाई के मुद्दे पर जनता को काफी निराश किया

संसद के शीतकालीन सत्र ने महंगाई के मुद्दे पर जनता को काफी निराश किया है। हालांकि महीना भर चले शीतकालीन सत्र दौरान संसद में महंगाई का मुद्दा, खासतौर पर खाने-पीने की चीजों की महंगाई का मसला चार बार उठाया गया। दो बार दोनों सदनों में इस पर बाकायदा बहस भी हुई। फिर भी इसमें शक की गुंजाइश नहीं है कि महंगाई के मामले में संसद ने लोगों को निराश ही किया है। संसद से जनता इस तरह मायूस हो, हमारे लोकतंत्र की सेहत के लिए यह अच्छा लक्षण नहीं है। जनता की निराशा की सबसे बड़ी वजह तो यही थी कि संसद के सत्र के दौरान भी खाने-पीने की चीजों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी होती रही। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, शीतकालीन सत्र की शुरुआत 7 नवंबर को खत्म हुए सप्ताह के जिन आंकड़ों के साथ हुई थी, उनमें खाने-पीने की वस्तुओं में महंगाई 14.55 फीसदी की दर दिखा रही थी। लेकिन महीने भर बाद जब यह सत्र खत्म हुआ, तो 5 दिसंबर को समाप्त हुए सप्ताह में महंगाई की दर पांच फीसदी से भी ज्यादा ऊपर चढ़कर 19.95 फीसदी तक पहुंच चुकी थी। यानी संसद में महंगाई पर चर्चा का नतीजा उलटा निकला। जैसे-जैसे संसद में बहस हुई, वैसे-वैसे महंगाई बढ़ती ही गई। जनता की निराशा की वजह सिर्फ यही नहीं है कि संसद में चर्चाओं के बावजूद महंगाई तेजी से बढ़ती रही। निराशा की वजह यह भी नहीं थी कि बार-बार यह मुद्दा उठने के
बावजूद सरकार कभी सूखे-बाढ़ का या खाद्यान्न पैदा करने वाले किसानों को पहले से ज्यादा समर्थन मूल्य दिए जाने का बहाना बनाती रही। कभी वह राज्य सरकारों द्वारा कालाबाजारी आदि से निपटने के लिए कारगर कदम नहीं उठाने को कोसती रही और खुद, अगली फसल आने पर महंगाई की दर नीचे आ जाने का जनता को दिलासा देने के सिवा कुछ करने के लिए तैयार ही नहीं हुई। जनता की निराशा की एक महत्वपूर्ण वजह यह भी थी कि सत्ता पक्ष ही नहीं आमतौर पर विपक्ष भी, इस मामले में खाना-पूरी ही कर रहा था। यह इसके बावजूद था कि अन्य वस्तुओं की महंगाई की तुलना में खाने-पीने की चीजों की महंगाई चौंकाने की हद तक थी। बेशक, इस अर्थ में यह अंतर कोई नया नहीं है कि जब से भारतीय अर्थव्यवस्था पर वैश्विक मंदी का असर दिखाई देना शुरू हुआ है, तभी से आम इन्फ्लेशन की दर तेजी से गिरी थी। यह महीनों तक शून्य से नीचे भी बनी रही, जबकि खाने-पीने की चीजों में महंगाई की दर इस पूरे दौर में न सिर्फ ऊंची रही है बल्कि उसमें बढ़त होती रही है। फिर भी यह सच हमारी राजनीति की मुख्यधारा से और ज्यादातर सांसदों की नजरों से छुपा ही रहा है कि फूड इन्फ्लेशन के आम इन्फ्लेशन से इतना ऊपर चढ़ जाने का सीधा सा अर्थ देश की गरीब जनता की कमाई पर सीधे-सीधे डाका डालना है। सचाई यह है कि जो लोग मेहनत-मजदूरी की कमाई से अपना पेट भरते हैं, उन्हें अपनी मामूली आमदनी का सबसे बड़ा हिस्सा पेट भरने में ही खर्च करना पड़ रहा है। फूड इन्फ्लेशन की ऊंची दर जहां एक ओर ऐसे लोगों की क्रय शक्ति में भारी गिरावट को दिखाती है, वहीं आम इन्फ्लेशन की निचली दर इसका इशारा करती है कि उनकी मजदूरी नहीं बढ़ रही है। मेहनत-मजदूरी करने वाले तबके पर दोहरी मार पड़ रही है। ऐसे तबके के पास जो बेचने को है यानी उनका श्रम, उसके दाम या तो घट रहे हैं या जहां के तहां बने हुए हैं, पर दूसरी ओर वह जो खरीदते हैं यानी मुख्यत: खाने-पीने की चीजें, उनके दाम तेजी से बढ़ रहे हैं। मेहनत-मजदूरी करने वालों की जिंदगी के लिए ऐसी महंगाई कितनी कष्टकर है, इसके अहसास की कोई गूंज संसद में नहीं सुनाई दी। यह संयोग ही नहीं था कि काफी शोर-शराबे के बाद 26 नवंबर को जब लोकसभा में इस मुद्दे पर चर्चा की बारी आई, तो सदन में कुल 26 सदस्य उपस्थित थे। यह उपस्थिति निचले सदन की कुल सदस्य संख्या के पांच परसेंट से भी कम थी। बाद में राज्यसभा में इसी मुद्दे पर हुई चर्चा में भी उपस्थिति ऐसी ही थी। यूं तो इस पर हुई चीख-पुकार के बाद सत्र के आखिर में इसी मुद्दे पर दोबारा हुई चर्चा में उपस्थिति कहीं बेहतर रही, पर इस बहस में हिस्सा लेने वाले अनेक सांसदों से एक अंग्रेजी दैनिक की बातचीत में यह सचाई सामने आई कि महंगाई पर चिंता जताने वालों में से भी अनेक को वास्तव में इस महंगाई का न तो कोई प्रत्यक्ष अनुभव है और ठीक-ठीक कोई अनुमान। पर इसमें अचरज की बात भी क्या है। मौजूदा लोकसभा में 300 से ज्यादा करोड़पति सांसद चुनकर आए हैं। यानी करीब 60 फीसदी। यह संख्या चौदहवीं लोकसभा के मुकाबले दोगुनी है। पंद्रहवीं लोकसभा में सिर्फ 21 सदस्य हैं, जिन्होंने चुनाव के समय अपनी घोषणा में अपनी परिसंपत्तियां 10 लाख रुपये या उससे कम बताई हैं। दिलचस्प है कि पिछड़े माने जाने वाले राज्यों में से उत्तर प्रदेश से चुने गए लोकसभा सदस्यों की औसत संपत्ति चार करोड़ रुपये बैठती है। राजस्थान के सदस्यों की तीन करोड़ रुपये, मध्य प्रदेश के सदस्यों की दो करोड़ रुपये और बिहार के सदस्यों की एक करोड़ रुपये। सत्ताधारी कांग्रेस के लोकसभा सदस्यों की औसत परिसंपत्ति चौदहवीं लोकसभा के चुनाव के समय के तीन करोड़ 40 लाख के आंकड़े से दोगुनी हो गई और पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव के समय छह करोड़ 80 लाख रुपये पर पहुंच गई। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बीजेपी के सांसदों की औसत प्रॉपर्टी एक करोड़ 20 लाख रुपये से बढ़कर तीन करोड़ 60 लाख रुपये के आंकड़े तक पहुंच गई, यानी तीन गुनी हो गई। अपनी सारी नेकनीयती के बावजूद 60 फीसदी करोड़पतियों वाली लोकसभा से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह इसका कोई अनुमान लगा सके कि करीब 20 प्रतिशत फूड इन्फ्लेशन के दौर में 20 रुपये रोजाना कमाने वाली देश की 78 प्रतिशत आबादी की गुजर-बसर कैसे होती होगी। मौजूदा सरकार में लोकसभा से आए मंत्रियों में 47 करोड़पति हैं और उनकी औसत प्रॉपर्टी 7 करोड़ 73 लाख की बैठती है। यानी लोकसभा सदस्यों की औसत प्रॉपर्टी से भी डेढ़ गुना ज्यादा। जब हमारे प्रतिनिधि इतने खास और अमीर हों और आम जनता बेहद लाचार, तो दोनों का साथ भला कैसे निभ सकता है?

Monday, January 4, 2010

बिग बाजार की मुंबई ब्रांच के स्टाफ में लगभग 80 फीसदी महिलाएं ही रखी गई हैं।

देश के रिटेल किंग किशोर बियानी का मानना है कि सरकार को उन लोगों पर कम टैक्स लगाना चाहिए जो ज्यादा खर्च करें। उन्होंने कहा कि मेरा नजरिया वस्तुओं के उपभोग का है, सरकार का नजरिया इससे अलग हो सकता है। वह अपनी किताब 'नए दौर की ओर' के रिलीज के मौके पर 'पाठकों से मिलिए कार्यक्रम' में लोगों के सवालों का जवाब दे रहे थे। इस कार्यक्रम का आयोजन नवभारत टाइम्स और प्रभात प्रकाशन ने नैशनल म्यूजियम में किया था। बियानी ने कहा कि महिलाओं का नजरिया डिटेल जानने के बारे में ज्यादा संवदेनशील होता है। इसलिए वे ज्यादा अच्छी रिटेलर्स साबित होती हैं। बिग बाजार की मुंबई ब्रांच के स्टाफ में लगभग 80 फीसदी महिलाएं ही रखी गई हैं। किशोर बियानी ग्रेजुएट हैं। हालांकि, उन्होंने कुछ दूसरे कोर्स भी किए हैं। उन्होंने कहा कि मुझे इस बात का दुख है कि मैं सीए या ऐसा कोई प्रफेशनल कोर्स नहीं कर पाया, इससे मुझे बिजनेस में कहीं ज्यादा सपोर्ट मिलता। देश में विदेशी कंपनियों का हौआ खड़ा होने के बारे में उन्होंने कहा कि यह सिर्फ मीडिया में ही चर्चा का विषय बना हुआ है। देश के रिटेल सेक्टर को इससे घबराने की जरूरत नहीं है। बनारस के बाजारों का जिक्र करते हुए बियानी ने कहा कि भारत का रिटेल बाजार बहुत मजबूत और व्यापक है। रिटेल सेक्टर में क्रांति लाने वाले किशोर बियानी ने 'तुम जानो न हम' और 'चुरा लिया है तुमने' जैसी फिल्में भी बनाई थीं, लेकिन इस फील्ड में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई। हालांकि, इससे उनके उत्साह में कोई कमी नहीं आई और वे अपने प्रयासों में डटे रहे। इस समय पूरे देश में उनके ग्रुप की 1500 दुकानें हैं और 30 हजार करोड़ रुपये का बिजनेस है। वे हर दिन एक नई दुकान खोल रहे हैं और उनका लक्ष्य 2011 तक 5500 दुकानें खोलने का है। सफलता का सूत्र बताते हुए उन्होंने कहा कि लोग अपने सीमित दायरे में ही सोचते रहते हैं जबकि आगे बढ़कर नए फैसले लेने की आदत डालने की जरूरत होती है। अपने फ्यूचर ग्रुप और बिग बाजार की मार्केटिंग पॉलिसी की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि आज वस्तुओं की क्वॉलिटी से समझौता नहीं किया जा सकता। साथ ही दाम कम रखने पर ध्यान देना जरूरी होता है। नवभारत टाइम्स की ओर से बियानी को उनका रेखाचित्र भेंट किया गया। इस मौके पर प्रभात प्रकाशन के डायरेक्टर प्रभात कुमार, मार्केटिंग हेड डॉ. पीयूष कुमार और बड़ी संख्या में व्यवसायी, छात्र, महिलाएं और पाठक मौजूद थे।

Saturday, January 2, 2010

नव वर्ष की शुभकामनाएं

नव वर्ष की शुभकामनाएं
हमारे प्रिय पाठकों को नव वर्ष की शुभकामनाएं
नव वर्ष 2010 आपकेलिए सुख-समृ​द्ध् आरोग्य, तथा मनोकामनाएं पूर्ण करे,
इन्ही शुभकामनाओं द्वारा आपके समक्ष नई आशाओं के साथ
डॉ राजेन्द्र कुमार गुप्ता

Sunday, December 27, 2009

सबसे स्मार्ट कही जाने वाली पुलिस इन अपराधों पर अंकुश लगाने में इतनी लाचार क्यों नजर आती

राजधानी में आए दिन होने वाली वारदातों के बाद अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर देश की सबसे स्मार्ट कही जाने वाली पुलिस इन अपराधों पर अंकुश लगाने में इतनी लाचार क्यों नजर आती है। अक्सर देखने में आता है कि वारदातों के सिलसिले में गिरफ्तार कई बदमाश या तो एनसीआर से ताल्लुक रखते हैं या उन्हें वहीं से पकड़ा जाता है। दिल्ली में अपराध करने वाले बदमाशों के लिए एनसीआर शरणस्थली का काम करता है। ऐसे बदमाशों को पकड़ने में कानूनी, राजनीतिक और कई दूसरी जटिलताएं अक्सर दोनों राज्यों की पुलिस के आड़े आ जाती हैं और अपराधी इसी का भरपूर फायदा उठाते हैं। बात चाहे पिछले साल लूटपाट और हत्या की ताबड़तोड़ वारदातें करके दिल्ली को दहला देने वाले ओमप्रकाश उर्फ बंटी की हो, बैंक लूट की कई वारदातों को अंजाम देने वाले सत्यप्रकाश उर्फ सत्ते की हो या दिल्ली एनसीआर के कुख्यात रावण की। इन सभी ने दिल्ली में वारदात करने बाद एनसीआर को और एनसीआर में वारदातें करने के बाद दिल्ली में शेल्टर लिया था। कई बदमाश तो दिल्ली के सीमावर्ती इलाकों में ही वारदातें करते हैं, क्योंकि उसके बाद वे फौरन यूपी या हरियाणा की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं। दिल्ली पुलिस लगातार पड़ोसी राज्यों की पुलिस के साथ कोऑर्डिनेशन बढ़ाने की बात कहती है और इसके लिए लगातार मीटिंग भी होती रहती हैं, लेकिन ग्राउंड लेवल पर इसका असर कम ही देखने को मिलता है। दिल्ली पुलिस के एक अनुभवी इंस्पेक्टर की मानें, तो दिल्ली में होने वाले क्राइम में चार कैटिगरी के बदमाशों की इनवॉल्वमेंट रहती है। पहली उन बदमाशों की है, जो मूलत: दिल्ली के हैं, दिल्ली में ही रहते हैं और दिल्ली-एनसीआर में वारदातें करते हैं। दूसरी उनकी जो बिहार, यूपी, उड़ीसा, झारखंड या किसी दूसरे राज्य से आकर दिल्ली की री-सेटलमेंट कॉलोनियों में बस गए और फिर यहां क्राइम करने लगे। तीसरी कैटिगरी बांग्लादेशियों, अफगानियों, नाइजीरियाइयों जैसे उन विदेशियों की है, जो या तो दिल्ली में ही रह रहे हैं या फिर क्राइम करने के मकसद से ही दिल्ली आते हैं। चौथी कैटिगरी उन बदमाशों की है, जिनका दिल्ली के क्राइम ग्राफ को बढ़ाने में सबसे ज्यादा रोल रहता है। इसमें शामिल हैं गाजियाबाद, लोनी, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, फरीदाबाद, गुड़गांव, बहादुरगढ़, मथुरा, बुलंद शहर, मेरठ, बागपत, अलीगढ़, सोनीपत, पलवल व मेवात के बदमाश, जो दिल्ली आते हैं, वारदात करते हैं और चले जाते हैं। पुलिस सूत्रों की मानें तो दिल्ली में होने वाले कुल अपराध में 60 प्रतिशत रोल इन्हीं बदमाशों का होता है। ये बदमाश किराये के वाहन लेकर दिल्ली आते हैं और यहां वाहन चोरी, सेंधमारी, स्नैचिंग और लूटपाट से लेकर अपहरण और हत्या तक की वारदातों को अंजाम देकर चले जाते हैं। दरअसल, ये बदमाश अपने क्षेत्र की पुलिस द्वारा आइडेंटिफाइड होते हैं और इसीलिए वारदातें करने के लिए दिल्ली आते हैं, क्योंकि दिल्ली पुलिस के पास न तो इनका कोई क्राइम रेकॉर्ड होता है और न इनके चेहरे दिल्ली पुलिस के लिए जाने पहचाने होते हैं। इसी वजह से दिल्ली पुलिस इन पर सर्विलांस भी नहीं रख पाती। ये बदमाश इसी का फायदा उठाकर दिल्ली में फ्री मूवमेंट करते हैं और दिल्ली पुलिस की सिरदर्दी बढ़ाकर चले जाते हैं।

इस हफ्ते रिलीज हुई 3 इडियट्स इन्हीं बातों को असरदार ढंग से उठाती हुई फिल्म है

अपने बच्चे को अपने उन अधूरे सपने को साकार करने का जरिया न बनाएं , जो आप नहीं कर पाए। हर साल देश में लगभग चार लाख युवक आत्महत्या करते है , जिनमें ज्यादा तादाद ऐसे युवकों की होती है जो बनना तो कुछ और चाहते है लेकिन घरवालों के सपनों को पूरा करने में उनके सपने चूर हो जाते हैं। इस हफ्ते रिलीज हुई 3 इडियट्स इन्हीं बातों को असरदार ढंग से उठाती हुई फिल्म है , जिस पर पूरी दुनिया को सोचने की जरूरत है। राज कुमार हिरानी की यह फिल्म पैरंट्स को यही समझाने की कोशिश है कि बच्चों की कामयाबी उनके काबिल बनने से है , चाहे उनकी चाह किसी भी फील्ड में हो। पिछले साल इसी महीने रिलीज हुई आमिर खान की गजनी ने बॉक्स ऑफिस पर ऐसा कमाल किया कि पहले हफ्ते ही फिल्म पर नोटों की जबर्दस्त बारिश हो गई। मूवी ने बॉक्स ऑफिस पर सबसे ज्यादा कमाई की। इस साल के आखिर में भी आमिर ने बॉक्स ऑफिस पर दस्तक दी और थिएटरों पर अपना कब्जा कर लिया। पूरे साल नंबर वन की रेस में शामिल रही सैफ अली खान की लव आजकल और सलमान खान की वॉटेंड भी 3 इडियट्स से पिछड़ती हुईं लग रही हैं। कहानी : रैंचो यानी रणछोड़दास श्यामलदास चांवड़ ( आमिर खान ) शहर के नंबर 1 इंजीनियरिंग कॉलेज में एंट्री करता है तो हर वक्त नंबर 1 की रेस और शानदार करियर के पीछे भागते स्टूडेंट्स को लगता है कि उन्हें यह साथी खुली हवा में उड़ने का मौका देने पहुंचा है। दरअसल , कॉलेज के सख्त मिजाज प्रिसिंपल वीरु सहस्त्रबुद्धि ( बोमन ईरानी ) का मानना है कि किसी भी सूरत में स्टूडेंट को नंबर 1 की धुन में डूबे रहना जरूरी है। करियर की इस गलाकाट रेस में किसी का रुकना उन्हें पसंद नहीं। ऐसे में कॉलेज के थके और दर्द में डूबे स्टूडेंट्स को रैंचो मिलता है , जो उनके दर्द का इलाज बनना चाहता है। कॉलेज में आकर रैंचों को लगता है ज्यादातर स्टूडेंट्स तो यहां मजबूरन मां - बाप की जिद और उनके अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए अपने सपनों का गला घोंट रहे हैं। रैंचो के रूम पार्टनर फरहान कुरैशी ( आर . माधवन ) और राजू रस्तोगी ( शरमन जोशी ) का भी यही हाल है। राजू इस कॉलेज में इसलिए पहुंचा है क्योंकि लकवे के शिकार उसके पिता और जिंदगीभर परिवार का पेट पालने वाली मां का सपना है कि वह इंजीनियर बने। वहीं , फरहान के अब्बा ( परीक्षित साहनी ) ने तो उसके पैदा होने पर ही उसके इंजीनियर बनने का सपना देखना शुरू कर दिया था। उन्हें इस बात से कुछ लेना - देना नहीं कि फरहान वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर बनना चाहता है। स्क्रिप्ट : मूवी की स्क्रिप्ट और दिल को छूते डायलॉग 3 इडियट्स की जान है। कई संवाद ऐसे हैं , जो हमारी व्यवस्था पर सटीक कमेंट कसते है। वहीं , कई डायलॉग स्टूडेंट्स के लिए मेसेज हैं और पैरंट्स के लिए एक सही सोच। बेशक अभिजीत जोशी और हिरानी की स्क्रिप्ट फिल्म का बेहद मजबूत पक्ष है। एक्टिंग : इस पूरी फिल्म में आमिर छाए हुए हैं। अपने असरदार अभिनय से दर्शकों को आखिर तक बांधने में वह पूरी तरह कामयाब रहे हैं। वहीं , शरमन और माधवन का जवाब नहीं । प्रिंसिपल वीरु के रोल में बोमन ईरानी कमाल कर गए हैं। करीना के हिस्से में कुछ खास नहीं आया , लेकिन अपने सिंपल लुक में वह भी खूब जमी हैं। म्यूजिक : फिल्म का म्यूजिक कहानी की डिमांड के मुताबिक है। जुबी डुबी और ऑल इज वेल गाने रिलीज से पहले ही पॉपुलर हो चुके हैं। आमिर और करीना पर फिल्माए जुबी डुबी गाने का फिल्माकंन गजब है। डायरेक्शन : राज कुमार हिरानी ने इस मूवी में भी अपने डायरेक्शन का जलवा दिखा दिया। उन्होंने साबित कर दिया कि उनके पिटारे से हर बार कुछ अलग और नया निकलता है। कहानी पर हिरानी की शुरू से आखिर तक पकड़ है। आमिर के रहते शरमन , माधवन , बोमन से हिरानी ने बेहतरीन काम लिया और हर एक की मौजूदगी को फिल्म का अहम हिस्सा बनाया। एक पल भी कहानी की गति को उन्होंने सुस्त नहीं पड़ने दिया। क्यों देखें : अगर आप बेहतरीन फिल्मों के इंतजार में रहते हैं , तो फौरन थियेटर पर पहुंच जाएं।

Sunday, December 20, 2009

मिलने वाली सुविधाओं या लाभ (पर्क्स)पर भी कर का बोझ पड़ सकता है।

सरकार अब कर्मचारियों को मिलने वाले लाभों (पर्क्स)मसलन हाउस रेंट और ट्रांसपोर्ट अलाउंस पर भी इसी वित्त वर्ष से टैक्स लगाने पर विचार कर रही है। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि वेतनभोगी वर्ग को अब उन्हें मिलने वाली सुविधाओं या लाभ (पर्क्स)पर भी कर का बोझ पड़ सकता है। सूत्रों ने बताया कि पर्क्स पर यह टैक्स इसी साल एक अप्रैल से लगाया जा सकता है। समझा जाता है कि सरकार जल्द ही हाउस रेंट अलाउंस और ट्रांसपोर्ट अलाउंस पर टैक्स के आकलन के लिए अधिसूचना जारी कर सकती है।
गौरतलब है कि बजट 2009-10 में फ्रिंज बेनिफिट टैक्स को खत्म कर दिया गया था। एफबीटी के खत्म होने के बाद अब सरकार की निगाह वेतनभोगी वर्ग को मिलने वाले पर्क्स पर टैक्स लगाने की है। एफबीटी में टैक्स का बोझ एंप्लॉयर (नियोक्ता) पर पड़ता था, लेकिन इस टैक्स का बोझ एंप्लॉयीज़ को उठाना पड़ेगा।