नाम सुन कर ही मतवाले हो उठें या फिर घृणा से भर उठें। ऐसे दिनों पर दरवाजा बंद कर घर में छुप कर कोई नहीं बैठता। इसकी जरूरत ही नहीं पड़ती। उन त्योहारों को कोई कम उत्साह से मनाता है और कोई ज्यादा उत्साह से। लेकिन इतना तीखा विभाजन नहीं होता। ऐसे प्रेम और नफरत का रिश्ता सिर्फ होली के साथ ही होता है। होली के प्रति उदासीन नहीं रहा जा सकता। यह त्योहार आपसे दो टूक सवाल करता है -आप इस खेमे में हो या उस खेमे में। यह ऊपर से ओढ़ी हुई गंभीरता को चीर कर फेंक देता है और आपको आपके असली रूप में उजागर करता है। इसीलिए इसे व्यक्ति के विरेचन का पर्व कहा जाता है। हमारी दमित इच्छाएं और कुंठाएं विमुक्त हो जाती हैं। इस दिन हम देख पाते हैं कि किस तरह समाज ने हमारी कुरूपता देख कर भी हमें खारिज नहीं किया। यह बोध व्यक्ति के विरेचन से कहीं आगे ले जाता है। होली में भारत का सांस्कृतिक मानस छुपा है। उस मानस में क्या है? इसे आप हुल्लड़ और रंगपाशी के रिवाजों से समझिए। आप सजे-संवरे बैठे हैं। दोस्तों और रिश्तेदारों का एक हुजूम आता है और आपको बदशक्ल बना देता है। आप के काले बालों में लाल गुलाल, गोरे चेहरे पर हरा रंग, सफेद कुर्ते पर कीचड़-मिट्टी पोत देता है। और आप हंसते हैं, नाराज नहीं होते। क्योंकि आप किसी व्यक्ति को अच्छे या बुरे रूप में स्वीकार करने के समाज के अधिकार को स्वीकार करते हैं। आपके गोरे रंग या काले बालों को कितना सुंदर माना जाए, यह तो समाज ही तय करता है। आप आईजी-डीआईजी, प्रफेसर, कवि या डॉक्टर हैं, पर किस प्रतिष्ठा के काबिल हैं, यह तो समाज ही तय करता है। होली का फूहड़पन हमको-आपको इसी सचाई का एहसास कराता है। इस बात का एहसास कि जो मान-प्रतिष्ठा है, जिसे हम अपनी खासियत मान लेते हैं, वह सब समाज का ही दिया है। अन्यथा हम सब किसी अन्य मनुष्य की तरह दो हाथ और दो पैरों वाले प्राणी हैं, कोई किसी से अलग नहीं। कैसा राजा, कैसा रंक। टीवी का एक विज्ञापन है -रंग से सराबोर एक बच्चा बारी-बारी से कई लोगों के पास जाता है और उनसे टॉफी के लिए पैसे मांगता है। उसके चेहरे पर इतना रंग पुता है कि उनमें से कोई नहीं पहचान पाता कि वह उनका बच्चा नहीं है। होली दरअसल हमें यही समझाती है कि जिंदगी के कई रंग ऐसे हैं, जिनमें डूबने के बाद हम सब एक जैसे होते हैं। हमारी वृत्तियों में, खुशियों में, मन के भीतर बैठे किसी बच्चे या युवा के नैसर्गिक उल्लास में कोई फर्क नहीं होता। जब हम बदशक्ल बनाए जाने या अपने ड्रॉइंग रूम को गंदा किए जाने से नफरत करते हैं, तो असल में हम उस झूठे अहंकार से घिरे होते हैं। किसी ने हमें रंग लगा दिया, कपड़े गीले कर दिए, भागने को मजबूर कर दिया तो हमारी ठसक, हमारी वह नकली प्रतिष्ठा, इज्जत की कलई उतर गई। लेकिन अपने लाड़ले के गाल पर एक लाल सा टीका लगा कर क्यों भला खुश होते हैं? या किसी को भूत सा चेहरा लिए झूम-झूम कर जोगिरा गाते देख कर क्यों हंसी आती है? या जब प्रेमिका चुटकी भर गुलाल फेंक कर भागती है, तब एक पिचकारी उसे मार कर आप भला क्यों निहाल हो जाते हैं? इसलिए कि यह पिचकारी उसे अपने रंग में रंग लेने, अपने हिसाब से ढाल लेने की आपकी इच्छा को मंजूर कर लेने की उसकी इच्छा का प्रतीक है। ठीक है, तुम जैसा चाहो, वैसे रंग डालो। लेकिन फिर ऐसे ही भला आपको भी कोई क्यों नहीं रंगे? क्या आपके दोस्तों और संबंधियों का -आपसे प्रेम करने वाले दूसरे लोगों का आप पर कोई अधिकार नहीं बनता? यदि एक दिन कपड़े पर कीचड़ डाल कर, किसी को मूर्ख नरेश कह कर मन की नफरत या गुस्सा निकल जाए तो क्या हर्ज है? सालों भर मन में दबा रहेगा तो रोडरेज होगा, पार्किन्ग और खिड़की का शीशा टूटने पर झगड़ा होगा। होली की थोड़ी सी ठिठोली, अवैध जुगुप्साकारी संबंधों से तो बेहतर होगी -जगहंसाई होगी पर परिवार तो नहीं तोड़ेगी। होली सिर्फ रंगों से नहीं होती। हास्य इसमें अनिवार्य रूप से शामिल है। लोग एक दूसरे का नामकरण करते हैं, चटपटी टिप्पणियां करते हैं, मूर्ख बनाते हैं और ऐसा करते हुए व्यक्ति की तमाम पहचान गौण हो जाती हैं और हर व्यक्ति समान धरातल पर आ खड़ा होता है। यह पैमाना है किसी समाज के सदस्यों की व्यक्तिवादी प्रवृत्ति को नापने का। हमारी सहनशक्ति को जांचने का। जो समाज एक-दूसरे पर हंसने का माद्दा नहीं रखता, वह भला एक साथ खुशी से जीवन कैसे गुजार सकता है। यह समाज और उसकी इकाइयों की सहनशक्ति का पैमाना है। आप लोगों पर हंसते हैं और लोग आप पर हंसते हैं, फिर भी कोई बुरा नहीं मानता। और सब लोग साथ रहते हैं।
Tuesday, March 10, 2009
सभी को होली की शुभकामनाएं
नाम सुन कर ही मतवाले हो उठें या फिर घृणा से भर उठें। ऐसे दिनों पर दरवाजा बंद कर घर में छुप कर कोई नहीं बैठता। इसकी जरूरत ही नहीं पड़ती। उन त्योहारों को कोई कम उत्साह से मनाता है और कोई ज्यादा उत्साह से। लेकिन इतना तीखा विभाजन नहीं होता। ऐसे प्रेम और नफरत का रिश्ता सिर्फ होली के साथ ही होता है। होली के प्रति उदासीन नहीं रहा जा सकता। यह त्योहार आपसे दो टूक सवाल करता है -आप इस खेमे में हो या उस खेमे में। यह ऊपर से ओढ़ी हुई गंभीरता को चीर कर फेंक देता है और आपको आपके असली रूप में उजागर करता है। इसीलिए इसे व्यक्ति के विरेचन का पर्व कहा जाता है। हमारी दमित इच्छाएं और कुंठाएं विमुक्त हो जाती हैं। इस दिन हम देख पाते हैं कि किस तरह समाज ने हमारी कुरूपता देख कर भी हमें खारिज नहीं किया। यह बोध व्यक्ति के विरेचन से कहीं आगे ले जाता है। होली में भारत का सांस्कृतिक मानस छुपा है। उस मानस में क्या है? इसे आप हुल्लड़ और रंगपाशी के रिवाजों से समझिए। आप सजे-संवरे बैठे हैं। दोस्तों और रिश्तेदारों का एक हुजूम आता है और आपको बदशक्ल बना देता है। आप के काले बालों में लाल गुलाल, गोरे चेहरे पर हरा रंग, सफेद कुर्ते पर कीचड़-मिट्टी पोत देता है। और आप हंसते हैं, नाराज नहीं होते। क्योंकि आप किसी व्यक्ति को अच्छे या बुरे रूप में स्वीकार करने के समाज के अधिकार को स्वीकार करते हैं। आपके गोरे रंग या काले बालों को कितना सुंदर माना जाए, यह तो समाज ही तय करता है। आप आईजी-डीआईजी, प्रफेसर, कवि या डॉक्टर हैं, पर किस प्रतिष्ठा के काबिल हैं, यह तो समाज ही तय करता है। होली का फूहड़पन हमको-आपको इसी सचाई का एहसास कराता है। इस बात का एहसास कि जो मान-प्रतिष्ठा है, जिसे हम अपनी खासियत मान लेते हैं, वह सब समाज का ही दिया है। अन्यथा हम सब किसी अन्य मनुष्य की तरह दो हाथ और दो पैरों वाले प्राणी हैं, कोई किसी से अलग नहीं। कैसा राजा, कैसा रंक। टीवी का एक विज्ञापन है -रंग से सराबोर एक बच्चा बारी-बारी से कई लोगों के पास जाता है और उनसे टॉफी के लिए पैसे मांगता है। उसके चेहरे पर इतना रंग पुता है कि उनमें से कोई नहीं पहचान पाता कि वह उनका बच्चा नहीं है। होली दरअसल हमें यही समझाती है कि जिंदगी के कई रंग ऐसे हैं, जिनमें डूबने के बाद हम सब एक जैसे होते हैं। हमारी वृत्तियों में, खुशियों में, मन के भीतर बैठे किसी बच्चे या युवा के नैसर्गिक उल्लास में कोई फर्क नहीं होता। जब हम बदशक्ल बनाए जाने या अपने ड्रॉइंग रूम को गंदा किए जाने से नफरत करते हैं, तो असल में हम उस झूठे अहंकार से घिरे होते हैं। किसी ने हमें रंग लगा दिया, कपड़े गीले कर दिए, भागने को मजबूर कर दिया तो हमारी ठसक, हमारी वह नकली प्रतिष्ठा, इज्जत की कलई उतर गई। लेकिन अपने लाड़ले के गाल पर एक लाल सा टीका लगा कर क्यों भला खुश होते हैं? या किसी को भूत सा चेहरा लिए झूम-झूम कर जोगिरा गाते देख कर क्यों हंसी आती है? या जब प्रेमिका चुटकी भर गुलाल फेंक कर भागती है, तब एक पिचकारी उसे मार कर आप भला क्यों निहाल हो जाते हैं? इसलिए कि यह पिचकारी उसे अपने रंग में रंग लेने, अपने हिसाब से ढाल लेने की आपकी इच्छा को मंजूर कर लेने की उसकी इच्छा का प्रतीक है। ठीक है, तुम जैसा चाहो, वैसे रंग डालो। लेकिन फिर ऐसे ही भला आपको भी कोई क्यों नहीं रंगे? क्या आपके दोस्तों और संबंधियों का -आपसे प्रेम करने वाले दूसरे लोगों का आप पर कोई अधिकार नहीं बनता? यदि एक दिन कपड़े पर कीचड़ डाल कर, किसी को मूर्ख नरेश कह कर मन की नफरत या गुस्सा निकल जाए तो क्या हर्ज है? सालों भर मन में दबा रहेगा तो रोडरेज होगा, पार्किन्ग और खिड़की का शीशा टूटने पर झगड़ा होगा। होली की थोड़ी सी ठिठोली, अवैध जुगुप्साकारी संबंधों से तो बेहतर होगी -जगहंसाई होगी पर परिवार तो नहीं तोड़ेगी। होली सिर्फ रंगों से नहीं होती। हास्य इसमें अनिवार्य रूप से शामिल है। लोग एक दूसरे का नामकरण करते हैं, चटपटी टिप्पणियां करते हैं, मूर्ख बनाते हैं और ऐसा करते हुए व्यक्ति की तमाम पहचान गौण हो जाती हैं और हर व्यक्ति समान धरातल पर आ खड़ा होता है। यह पैमाना है किसी समाज के सदस्यों की व्यक्तिवादी प्रवृत्ति को नापने का। हमारी सहनशक्ति को जांचने का। जो समाज एक-दूसरे पर हंसने का माद्दा नहीं रखता, वह भला एक साथ खुशी से जीवन कैसे गुजार सकता है। यह समाज और उसकी इकाइयों की सहनशक्ति का पैमाना है। आप लोगों पर हंसते हैं और लोग आप पर हंसते हैं, फिर भी कोई बुरा नहीं मानता। और सब लोग साथ रहते हैं।
Sunday, March 8, 2009
संजय दत्त के लखनऊ से चुनाव लडने पर मायावती कैंम्प में हडकंप
Friday, March 6, 2009
महात्मा गांधी की धरोहरों को प्रसिद्ध बिजनसमन विजय माल्या द्वारा खरीद लेने को बापू के प्रपौत्र तुषार गांधी ने चमत्कार करार दिया।
Monday, March 2, 2009
चुनावी जंग का ऐलान, उम्मीदवारी तय करेंगी आलाकमान,
चुनावों की घोषणा होते ही राजधानी में चुनावी सरगर्मियां बढ़ गई हैं। कांग्रेस चुनाव समिति के अधिकतर सदस्यों ने दिल्ली की सात सीटों पर उम्मीदवारों के चयन का अंतिम फैसला पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी पर छोड़ने का सुझाव दिया है। उधर, बीजेपी में भी उम्मीदवारों के नामों पर गंभीर चिंतन शुरू हो गया है। कांग्रेस चुनाव समिति की बैठक प्रदेश प्रभारी मुकुल वासनिक की अध्यक्षता में हुई। बैठक में सत्यव्रत चतुर्वेदी और डॉ. कुरियन भी मौजूद थे। इसके अलावा प्रदेश अध्यक्ष जयप्रकाश अग्रवाल, मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, उनके मंत्री डॉ. अशोक वालिया, अरविंदर लवली, हारून यूसुफ, किरण वालिया, दिल्ली के सांसद सज्जन कुमार, अजय माकन, कपिल सिब्बल, जगदीश टाइटलर, कृष्णा तीरथ, संदीप दीक्षित और सचिव व विधायक जयकिशन ने भी शिरकत की। बैठक में किसी उम्मीदवार के नाम पर तो चर्चा नहीं की गई, लेकिन यह साफ तौर पर कहा गया कि जो भी उम्मीदवार बनाया जाए, उसकी जीत का आधार अवश्य ही देखा जाना चाहिए। वह वर्करों में लोकप्रिय हो और उसकी छवि साफ होनी चाहिए। यह भी माना गया कि परिसीमन के बाद दिल्ली की सातों सीटों का स्वरूप बदल गया है, इसलिए अब किसी भी नाम पर फैसला करने से पहले यह अवश्य देखा जाना चाहिए कि वह जीत सकता है या नहीं। पार्टी के नेताओं ने वर्करों को यह संदेश देने पर भी जोर दिया कि विधानसभा चुनाव जीतने के बाद कांग्रेसी नेता हवा में न रहें और यह न समझें कि लोकसभा चुनाव आसानी से जीता जा सकता है, इसके लिए विरोधियों को कमजोर समझना भारी भूल होगी। विशेषकर उत्तर-पश्चिम दिल्ली की सुरक्षित सीट पर किसी बाहरी उम्मीदवार को लाने का विरोध किया गया। दूसरी तरफ बीजेपी ने दिल्ली स्तर पर उम्मीदवारों के नामों पर विचार तेज कर दिया है। हालांकि प्रदेश स्तर से 26 जनवरी को ही उम्मीदवारों के नामों के पैनल भेजे जा चुके हैं लेकिन उसके बाद से स्थितियां काफी बदल गई हैं। विजय गोयल अब चांदनी चौक की बजाय नई दिल्ली से लड़ना चाहते हैं। सुषमा स्वराज का नाम पश्चिमी दिल्ली से सामने आया है। चांदनी चौक से विजेंद्र गुप्ता और दक्षिण दिल्ली से प्रवेश वर्मा या रमेश बिधूड़ी के नामों पर चर्चा चल रही है। अभी पार्टी को हाईकमान के इशारे का इंतजार है और माना जा रहा है कि इसी सप्ताह कोई ठोस फैसला हो सकता है।
राजनीति में यह सब चलता है उल्टे लोकप्रिय होते है उम्मीदवार
हरियाणा के पूर्व डिप्टी सीएम चंद्रमोहन उर्फ चांद मोहम्मद से प्यार में धोखा खाने वाली अनुराधा बाली उर्फ फिजा ने अब सियासत के मैदान में धमाकेदार एंट्री करने का मन बना लिया है। वह लोकसभा चुनाव में नैशनल लोकहिंद पार्टी (एनएलपी)के उम्मीदवार के रूप में गाजियाबाद से बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह के खिलाफ मैदान में उतरेंगी। रविवार को बुलंदशहर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एनएलपी के अध्यक्ष डॉ. मसूद ने कहा कि फिजा ने मौजूदा हालात का सामना जिस तरह से किया है, उससे वह बहुत प्रभावित हैं। उन्होंने कहा कि हम फिजा को संसद में पहुंचाने के लिए कृतसंकल्प हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या फिजा से बात हुई है, तो उन्होंने जवाब दिया कि फिजा ने ही टिकट के लिए संपर्क किया है। मसूद ने कहा कि जिस दिन से अनुराधा ने इस्लाम धर्म कबूल किया है, वह इस्लाम की बेटी बन गई हैं। उसे न्याय दिलाने और संसद में पहुंचाने को पार्टी कमर कस चुकी है। पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. मसूद ने इस मौके पर सोहन पाल सिंह राजौरा को बुलंदशहर लोकसभा सीट से एनएलपी का उम्मीदवार बनाने की घोषणा करते हुए कहा कि पार्टी, अपना दल, बीएसफोर, सर्वोदय क्रांति पार्टी, भारतीय समाज पार्टी से गठबंधन के तहत प्रदेश की सभी लोकसभा सीटों पर अपना स्वतंत्र उम्मीदवार खड़ा करेगी।
Sunday, March 1, 2009
सुशासन, सुरक्षा और विकास के मुद्दों को रखने की कोशिश
अब पछताए क्या होत है जब चिडिया चुग गई खेत,
बीजेपी ने देश के विभिन्न क्षेत्रों से शनिवार को यूपीए पर चौतरफा हमला बोला। देश की सुरक्षा
और अर्थव्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान लगाने के लिए पार्टी ने कांग्रेस नीत यूपीए सरकार की नीतियों को दोषी ठहराया है। बीजेपी ने आगामी लोकसभा चुनावों के लिए अपनी रणनीति का खुलासा करते हुए देश की जनता के समक्ष सुशासन, सुरक्षा और विकास के मुद्दों को रखने की कोशिश की। इसी क्रम में पार्टी नेताओं ने किसानों और आम आदमी के हितों में काम करने के वादे किए। एनडीए की ओर से पीएम कैंडिडेट लालकृष्ण आडवाणी पिछले दिनों विभिन्न क्षेत्र के विशेषज्ञों की राय जानने का प्रयास करते रहे हैं और इस दिशा में बीजेपी का कहना है कि आर्थिक हालात बिगड़े हैं, लेकिन इससे भी बुरे दिन आने वाले हैं। उनका मानना है कि तीन-चार महीनों में डेढ़ करोड़ नौकरियां जाएंगी। वह किसानों की आत्महत्याओं और बढ़ती बेरोजगारी के लिए यूपीए सरकार की नीतियों को दोषी ठहराते रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि एनडीए सरकार की नदी जोड़ो परियोजना और हाइवे से गांवों को जोड़ने वाली संपर्क सड़क योजनाओं को यूपीए सरकार ने रोक दिया। सत्ता में आने पर एनडीए किसानों और आम आदमी के हितों का खास ध्यान रखेगा। इन्फ्रास्ट्रक्चर योजनाओं को प्रोत्साहन देगा, जिससे मंदी को दूर किया जा सकेगा। छोटे किसानों के लिए इनकम गारंटी स्कीम और वृद्ध किसानों के लिए पेंशन योजना शुरू की जाएगी। आंध्र प्रदेश में संकल्प रैली में आडवाणी ने कहा कि बीजेपी 'सुशासन, सुरक्षा और सभा क्षेत्रों में विकास' के मुद्दों पर चुनाव में उतरेगी। उन्होंने अमेरिका और इस्त्राइल की तरह आतंकवाद पर शून्य सहनशीलता पर चलने की सरकार से मांग की। उन्होंने कहा कि आम आदमी की सुरक्षा का मुद्दा महंगाई और बेरोजगारी से बड़ा विषय है। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी न दिए जाने का उल्लेख करते हुए आडवाणी ने आरोप लगाया कि यदि अफजल गुरु का नाम कुछ और होता तो फांसी की सजा पूरी कर दी जाती। पार्टी के महासचिव अरुण जेटली ने मुंबई में यूपीए सरकार पर पूरी तरह से विफलता का आरोप लगाया और कहा कि कांग्रेस का यह गठबंधन नेतृत्व के अभाव में संकट में है। गांधी परिवार का नाम लिए बिना आडवाणी की नेतृत्व क्षमता से तुलना करते हुए जेटली ने कहा कि अच्छा नेतृत्व सर्वानुमति बनाने की कला है लेकिन यूपीए में असली और नकली नेता का भ्रम फैलाया जा रहा है। प्रधानमंत्री को जब कि कप्तान होना चाहिए लेकिन यूपीए में वह नाइटवॉच मैन की भूमिका निभा रहे हैं। अन्य दलों की ओर भी ध्यान आकर्षित करते हुए जेटली का कहना था कि कुछ अन्य दल भी कांग्रेस मॉडल पर चलने लगे हैं लेकिन इस तरह के बंधक नेतृत्व को क्षमतावान नेतृत्व से बदल डालना चाहिए।
चुनाव आयुक्त नवीन चावला
तारीखों का ऐलान सोमवार को ही कर दिया जाएगा। इसके साथ ही सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी)एन. गोपालस्वामी की सिफारिशों को दरकिनार करते हुए चुनाव आयुक्त नवीन चावला को ही उनका उत्तराधिकारी बनाने का फैसला किया है। 20 अप्रैल को गोपालस्वामी के रिटायर हो जाने के बाद चावला मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यभार संभालेंगे। सरकार ने नवीन चावला को आयोग से हटाने की सीईसी एन. गोपालस्वामी की सिफारिश को खारिज कर दिया है। राष्ट्रपति भवन से जारी एक बयान के अनुसार, राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने चावला के खिलाफ सीईसी की सिफारिश को खारिज करने संबंधी सरकार की सिफारिश को स्वीकार कर लिया है। सरकार ने सिफारिश की थी कि सीईसी की रिपोर्ट और नवीन चावला को चुनाव आयुक्त के पद से हटाने की सिफारिश को खारिज किया जा सकता है। यह फैसला आम चुनावों और कुछ राज्यों में विधानसभा चुनावों के कार्यक्रम की घोषणा के कुछ दिनों पहले किया गया है। उम्मीद है कि तीन सदस्यीय आयोग एक- दो दिन के भीतर चुनाव की तारीखों का ऐलान कर देगा। चुनाव आयोग के सूत्र ने बताया कि आयोग तारीख पर फैसला कर चुका है और इसकी घोषणा अगले सप्ताह की जाएगी। उन्होंने कहा कि चुनाव चार से अधिक चरणों में होंगे। अगर चुनाव के तारीखों का ऐलान सोमवार को नहीं होगा तो सरकार को विज्ञापन अभियान के लिए कुछ और मोहलत मिल जाएगी। सरकार की ओर से 6 मार्च तक के लिए सारे विज्ञापन बुक कराए गए हैं, लेकिन चुनाव की तारीख का ऐलान इससे पहले होने पर इन विज्ञापनों को रोक दिया जाएगा। इस बीच कैबिनेट सचिव के. एम. चंद्रशेखर ने कई दिशा-निर्देशों पर भ्रम की स्थिति को स्पष्ट करने क लिए सीईसी गोपालस्वामी से मुलाकात की। सूत्र ने कहा कि कैबिनेट सचिव चाहते थे कि सारे मुद्दे स्पष्ट हो जाएं, ताकि चुनाव के दौरान कोई विवाद की स्थिति पैदा ना हो।
